उत्तरणी निर्झर
मकर राशि में सूर्य आज,
उमड़ा नहान को जन्म समाज।।
उमड़ा नहान को जन्म समाज।।
गंगा जी के पावन तट पर, आए सब देखो नारी - नर ।।
सद्यः प्रातः का वो स्नान,
आदित्य नमन स्पर्श दान ।।
आदित्य नमन स्पर्श दान ।।
खिचड़ी कहते, कहते पोंगल,
लोहडी हो या बीहू मंगल ।।
लोहडी हो या बीहू मंगल ।।
उत्तरायणी इसे कहते उत्तर,
संक्रांति यहाँ कहते सब नर।।
संक्रांति यहाँ कहते सब नर।।
नभ में उड़ता है कनकौआ,
लख लख डरता असली कौआ।।
लख लख डरता असली कौआ।।
फिरकी फिरती है घर घर घर,
उडती पतंग मेरी सर सर ।।
उडती पतंग मेरी सर सर ।।
अम्बर है पतंगों से अट्टे ,
कटती पतंग तो "वा काट्टे" ।।
कटती पतंग तो "वा काट्टे" ।।
वो गुड की सोंधी सी सुगंध,
मिलता जो तिल मुंगफली संग।।
मिलता जो तिल मुंगफली संग।।
ढुंढा, ढुंढी, तिलवा, पट्टी ,
चूड़ा हो और दही खट्टी ।।
चूड़ा हो और दही खट्टी ।।
गाजर के हलुए की खुशबू,
छिम्मी महँगी है ओर चहूँ ।।
छिम्मी महँगी है ओर चहूँ ।।
तन मे मस्ती मन मे उमंग,
चलते संगी सब एक संग ।।
चलते संगी सब एक संग ।।
बालाएँ आतीं बलखाती,
सखियों संग जातीं मुस्काती।।
सखियों संग जातीं मुस्काती।।
ढकता यौवन वह पट नवीन,
बहु भाँति रंजनों से रंगीन ।।
बहु भाँति रंजनों से रंगीन ।।
सरसों रहिला लतरी का साग,
धरती भी सजती भर सुहाग।।
धरती भी सजती भर सुहाग।।
सायं को खिचड़ी बनती है ,
चटनी -चोखा संग जमती है ।।
चटनी -चोखा संग जमती है ।।
मुखरित वाणी यह पण्डित की,
मम लेखनि उत्कीरणी लिखती।।
अन्तिम अनुनय यह सुधिजन से,
समुचित निर्णय करें मन से।।
~दुर्गेश पण्डित
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