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*🌼मैं लिखता हूँ सुनने के लिए🌼*

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मैं लिखता हूँ सुनने के लिए     शब्दों की सुन्दर बगिया से मधुर कुसुम चुनने के लिए, मैं लिखता हूँ सुनने के लिए।।                                                                          मन अलिन्द ज्यों ज्यों उडता है, बगिया  के रस भरे  पुष्प से ; लिए  रसों का  संग्रह कर के ,                                      गंध नया सुंघने के लिए ।।  मैं  लिखता  हूँ सुनने  के लिए... बैठ निसर्ग की सदय क्रोड मे, अनुभव गम्य सृष्टि रचना को; शनैः शनैः अवशोषित करके, नश्वर  जग भुलने के लिए ।। मैं लिखता हूँ सुनने के लिए...                   निज प्रज्ञा के  रिक्त तन्तु में, मोती  से वर्...

वसुंधरा

नमो धरित्रि माँ धरा,  निकुंज कुंज भूधरा। मही क्षिति पयोधरा,  नमोऽस्तु ते वसुंधरा॥  नमोऽस्तु ते हरि प्रिया,  नमो पृथू की आत्मजा।   हे! शुक्र  की  सहोदरा,   नमोऽस्तु  ते  वसुंधरा॥  हिमाद्रि  तुंग  श्रृंग  से,  किरीट  शीश धारिणी।  दुकूल  कूल  जलधरा,  नमोऽस्तु   ते  वसुंधरा॥  नमामि शस्य श्यामला,   प्रसून   पत्र  निर्मला।   तरू दरख़्त द्रुभ धरा,   नमोऽस्तु  ते  वसुंधरा॥  विशिष्ट सृष्टि शालिनी,  समस्त जीव पालिनी।  नरोऽपि वा निकुंजरा,  नमोऽस्तु  ते वसुंधरा॥  मुनिंद्र,  संत , वन्दिता नमन्ति मूढ़, पण्डिता ।  कवीन्द्र कूचि की गिरा,  नमोऽस्तु  ते वसुंधरा॥  ©दुर्गेश पण्डित

उत्कीरणी...

उत्कीरणी  जीवन  की  नव  तरणी   अए! अए मम लेखनि!उत्कीरणी अए!   हे मम रागिनि! हे वणतूलिका!   मम नयनों  की निर्झरणि अए !  अए मम लेखनि!उत्कीरणी अए!   मेरी अनुरागिनी!हे मम संगिनी!   मम जीवन की अनुचरणि अए!  अए मम लेखनि! उत्कीरणी अए!   हे मम बगिया की नवलतिका!   मम काव्यकला! उपमान नए!  अए मम लेखनि!उत्कीरणी अए!   मम हृदय हर्ष हे!हे मम प्रेमिका!   चञ्चल  दृग का  आलम्बन ए!   अए मम लेखनि! उत्कीरणी अए!     मम मान अए! सम्मान अए!     मेरी  प्रतिभा  का गान अए!   अए मम लेखनि! उत्कीरणी अए!   मम पितृ अए! मम  मातृ अए!   मम भ्रातृ सखा,मम तनय जियें!  अए मम लेखनि! उत्कीरणी अए!   नव यौवन  ए! नव जीवन  ए!   इस "पण्डित" की तुम प्राणप्रिये!   अए  मम लेखनि! उत्कीरणी  अए!   जीवन  की नव तरणि  अए!   अए मम लेखनि! उत्कीरणी अए!                 ...

जन विभीषिका

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पुर  के  प्रतिवेश धरातल पर छल छंद रचे जो विनाशक हैं; परिशोध  हुए  चमगादड़  पर उत्पन्न हुए भव - ग्राहक हैं ॥  कपटी कर्तव्य कुटिलता का  परिणाम  महा भयकारी...,  उस विष का नाम कोरोना है  फैली जिससे महामारी... ॥  संसार  धरातल  डोल  रहा विकराल काल मुह खोल रहा,  अब हाय - हाय करती वसुधा संहारक - नर विष घोल रहा ॥  चहुँ ओर है हा हा कार मचा कब आएगी किसकी बारी..,  उस विष का नाम  कोरोना  है  फैली जिससे महामारी... ॥ आक्रमण अशुद्ध विषाणु का नहिं  युद्ध  ये  है परमाणु का,  प्रतिघात है या आघात  है ये या विप्लव की शुरुआत है ये॥  विक्षुब्ध पड़े  यहाँ  देश सभी  संग्राम  ये  है  प्रलयंकारी... , उस विष का नाम  कोरोना  है  फैली जिससे महामारी... ॥ इस संकट का उपचार नहीं परिरंभ नहीं और प्यार नहीं,  दुनिया सुनसान भई पल में बढ़ते शमशान महीं तल में॥  चिंतित हैं सभी उद्विग्न सभी  सब आहत हैं  नर - नारी...,  ...