वसुंधरा

नमो धरित्रि माँ धरा, 
निकुंज कुंज भूधरा।
मही क्षिति पयोधरा, 
नमोऽस्तु ते वसुंधरा॥ 

नमोऽस्तु ते हरि प्रिया, 
नमो पृथू की आत्मजा। 
 हे! शुक्र  की  सहोदरा, 
 नमोऽस्तु  ते  वसुंधरा॥ 

हिमाद्रि  तुंग  श्रृंग  से, 
किरीट  शीश धारिणी। 
दुकूल  कूल  जलधरा, 
नमोऽस्तु   ते  वसुंधरा॥ 

नमामि शस्य श्यामला, 
 प्रसून   पत्र  निर्मला। 
 तरू दरख़्त द्रुभ धरा, 
 नमोऽस्तु  ते  वसुंधरा॥ 

विशिष्ट सृष्टि शालिनी, 
समस्त जीव पालिनी। 
नरोऽपि वा निकुंजरा, 
नमोऽस्तु  ते वसुंधरा॥ 

मुनिंद्र,  संत , वन्दिता
नमन्ति मूढ़, पण्डिता । 
कवीन्द्र कूचि की गिरा, 
नमोऽस्तु  ते वसुंधरा॥ 

©दुर्गेश पण्डित

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