जन विभीषिका
पुर के प्रतिवेश धरातल पर
छल छंद रचे जो विनाशक हैं;
परिशोध हुए चमगादड़ पर
उत्पन्न हुए भव - ग्राहक हैं ॥
कपटी कर्तव्य कुटिलता का
परिणाम महा भयकारी...,
उस विष का नाम कोरोना है
फैली जिससे महामारी... ॥
संसार धरातल डोल रहा
विकराल काल मुह खोल रहा,
अब हाय - हाय करती वसुधा
संहारक - नर विष घोल रहा ॥
चहुँ ओर है हा हा कार मचा
कब आएगी किसकी बारी..,
उस विष का नाम कोरोना है
फैली जिससे महामारी... ॥
आक्रमण अशुद्ध विषाणु का
नहिं युद्ध ये है परमाणु का,
प्रतिघात है या आघात है ये
या विप्लव की शुरुआत है ये॥
विक्षुब्ध पड़े यहाँ देश सभी
संग्राम ये है प्रलयंकारी... ,
उस विष का नाम कोरोना है
फैली जिससे महामारी... ॥
इस संकट का उपचार नहीं
परिरंभ नहीं और प्यार नहीं,
दुनिया सुनसान भई पल में
बढ़ते शमशान महीं तल में॥
चिंतित हैं सभी उद्विग्न सभी
सब आहत हैं नर - नारी...,
उस विष का नाम कोरोना है
फैली जिससे महामारी... ॥
प्रतिबंधित है बाहर जाना
छूना, मिलना और बतियाना,
बाजार का भोजन त्याग सखे
पाना घर का सात्विक खाना॥
जन - अंतर हो सम्पर्क न हो
सरकार ने की तईयारी... ,
उस विष का नाम कोरोना है
फैली जिससे महामारी... ॥
दृढ़ लें संकल्प करें निश्चय
संयम से ही होती है जय,
घर में रहकर अनुताप हरें
पूजा अर्चन और जाप करें॥
कहती पण्डित की उत्कीरणी
भव -ताप हरो त्रिपुरारी... ,
उस विष का नाम कोरोना है
फैली जिससे महामारी... ॥
©दुर्गेश पण्डित
wahh bahut khoob rachna hai
जवाब देंहटाएंवाह अद्भुत...
जवाब देंहटाएंजबरदस्त भाषा शैली...
अद्भुत प्रवाह...
जबरदस्त लय....
जय भोलेनाथ
Great
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