वन्दना
जय वाग्देवी!जय जय सुरभारती,
जय जग जननी माता....;
तेरा मन निर्मल कहलाता,
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
मेरे मन मन्दिर के तम हर,
ज्ञानविभामयी ज्योतिर्मय कर;
ज्ञान का वर दे माता...;
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
वीणा वादिनी पुस्तक धारिणि,
हंस वाहिनी हे! भव तारिणि;
ललित कलामयी माता...;
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
यह जल-थल और ये अंबर,
इस सृष्टि का हर एक चराचर;
महिमा तेरी ही गाता...;
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
अपनी करुणा जल से धोकर,
माँ मेरा भी मन निर्मल कर;
देर न कर मेरी माता....;
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
हे दयामयी माँ! दया कर,
त्रिभुवनमयी हम पर कृपा कर;
विश्व विजय कर माता...;
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
- दुर्गेश पण्डित
जय जग जननी माता....;
तेरा मन निर्मल कहलाता,
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
मेरे मन मन्दिर के तम हर,
ज्ञानविभामयी ज्योतिर्मय कर;
ज्ञान का वर दे माता...;
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
वीणा वादिनी पुस्तक धारिणि,
हंस वाहिनी हे! भव तारिणि;
ललित कलामयी माता...;
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
यह जल-थल और ये अंबर,
इस सृष्टि का हर एक चराचर;
महिमा तेरी ही गाता...;
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
अपनी करुणा जल से धोकर,
माँ मेरा भी मन निर्मल कर;
देर न कर मेरी माता....;
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
हे दयामयी माँ! दया कर,
त्रिभुवनमयी हम पर कृपा कर;
विश्व विजय कर माता...;
मेरी विनती सुनो हे माता!..।।
- दुर्गेश पण्डित

बहुत बेहतरीन भैया। अत्युत्तम रचना।
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