हँसती कली ...
वो हँसती कली थी,
मुस्कुराती चली गई।
जीवन की दुःसह पीड़ा को,
खुशियों में लुटाती चली गई।
वो हँसती कली थी,
मुस्कुराती चली गई।
उसे तो पता भी न था,
टूटेगा कहर..नियति का..
एक दिन..उसके ऊपर..।
खुश रहती,सभी को हँसाती थी,
ग़म तो थे ही,पर मुस्कुराती थी;
हर शिकवे हर गिले को,
. .भुलाती चली गई।
वो हँसती कली थी,
मुस्कुराती चली गई।
जीवन की दुस्वारियों को,
देखा ही कहाँ उसने तो.;
दिन तो छुटपन के ही
बचपन के थे अभी तो।
खेलती थी सखियों संग
. .पढ़ने भी जाती थी
अव्वल थी आती चली गई।
वो हँसती कली थी,
मुस्कुराती चली गई।
कहता है "पण्डित",
. .सुनो ऐ सुजानों ;
बहन थी वो मेरी ,
भैया भैया बुलाती चली गई।
वो हँसती कली थी,
मुस्कुराती चली गई।
- दुर्गेश पण्डित
वाह्ह भैया। मैं वो दर्द समझ सकता हूँ जो आप पर बीती है। बहुत ही सुंदर रचना गढ़ी है आपने। अत्यंत मार्मिक और वो कहते हैं न! कि भाग्य के आगे कौन जीत सकता है। स्वीकारिये और आगे बढ़िये।
जवाब देंहटाएंVery nice pandit g
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर कविता है|
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