प्रांकुरण


मस्ते    लम्बोदरं    विघ्नहर्ता,
नमः शूलपाणी नमो वीणापाणी।
नमो   सर्वदेवाः  नमः सर्वभूता,
प्रणम्यम् सदा वत्सले मातृभूमे।।
ईष्टं  नमो गर्जमानम्  कपीन्द्रम् ,
नमो मम् गुरुं च नमः सर्व विप्रं।।
कथयामि वृत्तान्त सम्भव स्वकीयं,
इच्छामि  पुर्णाहुतिं  त्वत्प्रसादम् ।।
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करता हूँ नमन कर विनय सदा,
सब  देवों , गुरु, भू - देवों  का।
निज मातृभूमि को कर  प्रणाम,
निज ईष्ट चरण अभिलाषी  हूँ।।
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मैं   केवल  भारत  वासी  हूँ ,
हाँ  केवल  भारत  वासी  हूँ ।।
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है  काशी  जी  मेरा  उद्भव,
गुजराती  जी  का पोता हूँ।
पितु मेरे हैं श्यामा के कन्त,
सरिता  का भी मैं बेटा हूँ ।।
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दादा जी स्वयं प्रभु मार्कण्डेय,
जिनने  गाड़े  कुल के  झण्डे।
जब  से  मैंने  था जन्म लिया,
तब  से  काशी का वासी हूँ ।।
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मैं  केवल  भारत  वासी  हूँ ,
हाँ  केवल  भारत  वासी हूँ ।।
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सुदि  दो  हजार  उनचास  थी,
अरु  वरद  विनायक   चतुर्थी।
फिर गणपति का वरदान मिला,
निज कुल में मैं बन पुष्प खिला।।
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सावर्ण्य   गोत्र   सरयू   पारी ,
द्विज वर्ण का हूँ  मैं अधिकारी।
कुल  गौरव  एवं  राष्ट्र  हितैषी,
विद्या   का   अभिलाषी   हूँ  ।।
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मैं  केवल  भारत  वासी  हूँ ,
हाँ  केवल  भारत वासी  हूँ ।।
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मैया   ये   बात   बताती   है,                                  
वो सब कुछ कह समझाती है।
मृत  प्राय  हुआ  मैं  पैदा हाय,
फिर  दाई  बन गई पन्ना धाय।।
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ले  गई  मुझे  वो  शीतल  घर,
चिल्लाया मैं क्याँ क्याँ कहकर।
फिर  रोते - रोते   मैं  आया ,
माँ  के  जिगरे  की  राशी  हूँ ।।
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मैं  केवल  भारत  वासी  हूँ ,
हाँ  केवल  भारत  वासी हूँ ।।
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अस्वस्थ  रहा मैं  जन्म समय ,
रोता  ही रहा  रोता  ही  रहा ।
डाॅक्टर  बोले गोली ये खिला ,
चुप हो तो गया सोता ही रहा।।
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पय  पान  भुला  मैं  रोता  था,
चीनी - पानी  पी   सोता   था।
माँ  दिन  भर दूध पिलाती थी,
निश्छल  ममता सुख राशी हूँ।।
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मैं  केवल  भारत  वासी  हूँ ,
हाँ  केवल  भारत वासी  हूँ ।।
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एक वर्ष गए कुछ समय हुआ,
माँ  के  कष्टों का  अन्त हुआ।
नानी  के  घर  मैं  खेल  रहा,
उनके ही  घर एकदन्त हुआ।।
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मम अनुज के आने  की बारी,
नानी  मेरी   कितनी  प्यारी ।
वो  लाड  लडाती थी मुझको,
कहती भव निशा  प्रकाशी हूँ।।
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मैं  केवल  भारत  वासी  हूँ ,
हाँ  केवल  भारत वासी  हूँ ।।
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मम अनुज तदन्तर मम भगिनी,
भगिनी के अन्तर  नव  विवेक।
चत्वार ,  चतुष्टय ,  वा    चतुर्थ ,                                  अनुजं अनुजा फिर फिर अनुज।।
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इति मह्यम जन्म समय विवरण,
कहता “पण्डित” कर संस्मरण।
निज  जीवन  चित्र  उकेर सकूँ,
इस  इच्छा  का  अभिलाषी हूँ।।
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मैं  केवल  भारत  वासी  हूँ ,
हाँ  केवल  भारत वासी  हूँ ।।
                           -दुर्गेश पण्डित

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